डियर जिंदगी: हम कैसे बदलेंगे!

परंपरा, ‘ऐसा होता आया है’ के आधार पर जब तक हम चीज़ों को बुनते रहेंगे, वह अपने होने के अर्थ तक नहीं पहुंच सकतीं.

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